आज जनकवि अदम गोंडवी जी की दो कविताएं बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत कर रहा हूँ। गज़ल के छंद में उनकी रचनाएं हिंदुस्तान के आम आदमी की परिस्थितियों को, उसकी भावनाओं को अभिव्यक्ति देती थीं। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक गांव में रहने वाले गोंडवी जी शहर की तड़क-भड़क से दूर रहे और उन्होंने गरीबों, पिछड़ों, दलितों को अपनी कविताओं के माध्यम से ज़ुबान दी।

 

 

प्रस्तुत हैं गोंडवी जी की दो रचनाएं-

 

-1-

 

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है,
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है।

 

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का,
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है।

 

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले,
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।

 

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी,
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है।

 

-2-

 

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।

 

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में।

 

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह,
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में।

 

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें,
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में।

 

जनता के पास एक ही चारा है बगावत,
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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