आज एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि स्व॰ रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में उन्होंने नए घर में प्रवेश के बाद इंसान और वहाँ लगे शहतूत के पेड़ की स्थितियों में बदलाव को बड़े सहज ढंग से अभिव्यक्ति दी है|

समृद्धि की आवश्यकता मनुष्य और वृक्ष दोनों को होती है और सभी जीव खुशहाल हों यही अच्छा लगता है ना! लीजिए प्रस्तुत है स्व॰ रमेश रंजक जी का यह गीत-

 

 

जिस दिन मैंने
अपने मकान में पाँव रखा
पतझड़ के दिन थे,
मुझ पर और इस शहतूत पर
जो मेरे आँगन में खड़ा है —
उधर पत्ते न थे
इधर पैसे न थे
हम दोनों एक जैसे थे,
मटमैली ज़मीन से जुड़े हुए ।

 

मैंने तने को कुरेद कर देखा
तना
पानी पड़े सूखे गत्ते की तरह
गीला था,
हौसले की हल्की नज़र से
शहतूत ने मुझे देखा
एक उम्मीद की शहतीर
हमें साधे रही
महीनों तक ।

 

दिन फिरे
पतझड़ के मन फिरे,
पोंपले खुलने लगीं पाँखों-सी
उँगलियों-सी बढ़ने लगी टहनियाँ,
पत्ते हथेली की तरह लहराने लगे जैसे-जैसे
पैसे मेरे हाथ में आने लगे वैसे-वैसे,
ग़रीबी हम दोनों ने काटी एक साथ
शहतीर को सँभाले हुए ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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