आज मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक अत्यंत मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे मुकेश जी और लता जी ने 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म – फिर कब मिलोगी के लिए गाया था और इस गीत में प्रत्येक पंक्ति के बाद जो गूंज रह जाती है, वह विशेष प्रभाव छोड़ती है| मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत को मुकेश जी और लता जी ने, आर डी बर्मन साहब के संगीत निर्देशन में अनोखे अंदाज़ में गाया है|

 

 

लीजिए गीत के बोलों को सुनकर उस अनोखी अदायगी को याद कीजिए-

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

 

दूर ज़ुल्फों की छाँव से, कहता हूँ ये हवाओं से,
उसी बुत की अदाओं के, अफ़साने हज़ार|
वो जो बाहों मे मचल जाती, हसरत ही निकल जाती,
मेरी दुनिया बदल जाती, मिल जाता करार|

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

 

अरमां है कोई पास आए, इन हाथों मे वो हाथ आए,
फिर खवाबों की घटा छाये, बरसाए खुमार|
फिर उन्ही दिन रातों पे, मतवाली मुलाक़ातों पे,
उलफत भारी बातों पे, हम होते निसार|

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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