मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका  

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत […]

फटी हुई जेबों में करुणा!

आज सुबह की घटना के बहाने बात करना चाहूंगा। सुबह के समय मैं अपनी सोसायटी के पीछे बने स्टोर से दैनिक सामान खरीदने जाता हूँ। जो वस्तुएं मैं सामान्यतः खरीदता हूँ उनमें दूध के पैकेट और फल के नाम पर […]

गीतों के दाम की तरह!

लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है। ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड […]

जो मिलता है, उसका दामन भीगा लगता है!

आज क़ैसर उल जाफरी जी की लिखी एक गज़ल याद आ रही है, जिसके कुछ शेर पंकज उधास जी ने बड़ी खूबसूरती से गाए हैं। वास्तव में उदासी की, अभावों की और प्यार के अभाव की और लगभग दीवानगी की […]

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम!

आज फिर से मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है। जनकवि शैलेंद्र जी का लिखा यह गीत, 1962 में बनी फिल्म- आशिक़ के लिए मुकेश जी ने शंकर जयकिशन जी के संगीत निर्देशन […]

अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत […]

44. रोशनी के साथ हंसिए बोलिये!

आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज गुड़गांव से, गोवा की तरफ रवानगी का ज़िक्र और फिर से कुछ पुरानी यादें ताज़ा करने का अवसर है। संक्रमण काल है, सामान जा चुका, अब अपने जाने की बारी […]

गोवा कार्निवाल

यह कहा जाता है कि जहाँ रहते हैं, वहाँ का गाना भी चाहिए! वैसे भी जहाँ इंसान रहता, वहाँ की विशेषताओं से वह परिचित होता ही है और कभी वहाँ के बारे में बात करने के लिए मज़बूर भी हो […]

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