पिछली बार जैसा मैंने बताया था, निकले थे ‘लंदन आई’ और टॉवर ब्रिज देखने के लिए, लेकिन ‘लंदन आई’ की बात में ही लगा कि एक दिन के लिए इतना ही काफी है, क्योंकि ये उम्मीद तो की जाती है और ऐसा भी सोचना होता है कि उतना ही लिखा जाए जितना कोई एक बार में पढ़ पाए।

तो अब आगे की बात कर लेते हैं, टॉवर ब्रिज जाने के लिए हमने ‘लंदन आई’ वाले बस स्टॉप- वाटरलू से ही बस पकड़ी। वैसे मानना पड़ेगा कि लंदन में बस यात्रा और ट्यूब रेल यात्रा भी काफी आरामदायक हैं, हाँ बंदे को यह तो याद करना पड़ेगा कि स्टेशन में किधर से घुसना है और किधर निकलना। वैसे भी एक ही जगह पर दो-तीन दिशाओं में जा रही रेल लाइनें हैं, किधर जाकर कौन सी पकड़ेंगे और कहाँ निकलेंगे, ये याद करने में टाइम तो लगेगा, कुछ हद तक तो यह समस्या अब भारत में, दिल्ली में भी आती है!

फिर देखिए मैं इधर-उधर की बातें करने लगता हूँ। तो हम बस पकड़कर टॉवर ब्रिज के पास वाले स्टॉप पर पहुंचे और वहाँ से थोड़ा पैदल चलकर टॉवर ब्रिज के प्रवेश मार्ग पर पहुंचे।
वैसे तो लंदन में थेम्स नदी पर, आज की तारीख में 24 ब्रिज हैं, लेकिन टॉवर ब्रिज तो जैसे इंजीनियरिंग का एक नायाब नमूना है और जैसे लंदन की पहचान बन गया है। यह ब्रिज जून,1886 में बनना शुरू हुआ था और कुशल इंजीनियरिंग, कारीगरी और मेहनत के बल पर 8 वर्ष बाद, जून, 1894 में चालू किया गया। नदी के दोनों तरफ बने टॉवरों को जोड़ने वाले इस पुल की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि दिन में कुछ खास समयों पर नदी पर बना यह विशाल पुल, बीच में से दो हिस्सों में ऊपर उठा दिया जाता है, जिससे नदी में से होकर विशाल जहाज आदि दूसरी तरफ जा सकें।

एक बड़ी राहत की बात मुझ जैसे बुज़ुर्ग लोगों के लिए यह भी है कि टॉवर में ऊपर चढ़ने के लिए लिफ्ट की व्यवस्था है। ऊपर दोनों टॉवरों के बीच दोहरा रास्ता है, जिसमें ब्रिज के और इसकी इंजीनियरी के इतिहास के संबंध में फिल्मों और प्रदर्शनी के माध्यम से उपयोगी जानकारी दी गई है। वहीं बीच में कुछ भाग में पारदर्शी शीशे का फर्श है, जिसमें से नीचे देखने पर इस पुल की ऊंचाई का एहसास होता है और शुरू में डर भी लगता है। कुल मिलाकर लंदन की पहचान की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाने वाला यह पुल भी, जितनी बार देखा जाए, हर बार इसमें रोमांच, उत्साह और जानकारी की बढ़ोतरी होगी।

आगे और बात कल करेंगे, आज के लिए इतना ही

नमस्कार।