218. ये कहानी फिर सही!

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अभी लंदन में ही कुछ दिन और हूँ, और कुछ यहाँ के बारे में शेयर करने का मन होगा तो अवश्य करूंगा। एक बात अभी यही कहना चाहूंगा कि यहाँ कुत्ते खूब देखने को मिलते हैं, लेकिन सभी अपने स्वामी अथवा सेवक के साथ! सड़क पर कोई आवारा कुत्ता अभी तक तो नहीं मिला , संभव है कोई ऐसा कोना लंदन का हो, जहाँ पर वे भी हों। और एक बात, बच्चों के बारे में सुना कि यहाँ पर लोग उनको पहले तो प्रैम में रखते हैं उसके बाद वे पैदल चलते हैं। बच्चों को वे गोदी में लेकर नहीं चलते, हाँ  कुत्तों को गोदी में लेकर जाते हुए  मैंने कुछ  लोगों को देखा। और कुत्ते भी यहाँ कुछ अलग तरह के दिखे, कुछ नेवले जैसे भी, छोटे-छोटे पैर, ऊंचाई भी कम लेकिन लंबाई अनुपात में काफी अधिक।

खैर आज पुराने रंग में, कुछ गीत-गज़ल की पंक्तियां याद आ रही हैं, पहले तो ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म के एक ज्यादा प्रचलित न हुए गीत में मुकेश जी की गाई हुई कुछ पंक्तियां, जो मुझे काफी अच्छी लगती हैं-

गोरे तन से चमके बिजुरिया,
कहीं आग न लग जाए।
मैंने हमेशा ज़ख्म ही खाए,
जिससे भी दिल को लगाया,
जब भी हंसा मैं, जग को हंसाने,
आंखों में पानी आया,
दिल के जले को तुम न जलाना,
आग न लग जाए। 

अब इसके बाद, इसी भावभूमि पर गुलाम अली जी की गाई हुई, ज़नाब मसरूूूरर अनवर की एक गज़ल, जो बहुत प्रचलित है और कई बार हम ज्यादा प्रचलित होने के कारण भी कुछ चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। लीजिए प्रस्तुत है ये गज़ल भी-

हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही।

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही।

नफरतों के तीर खा कर, दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही।

क्या बताएं प्यार की बाजी, वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही।

आज अचानक ये रचनाएं याद आ गईं, आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।