एक महीने के प्रवास के बाद लंदन से लौटकर गोआ आ गए। जेटलेग का प्रभाव भी समाप्त हो रहा है, वैसे मुझे लगता है कि ऐसे स्थान पर, इतना लंबा समय रहकर आओ तो जेटलेग शरीर से ज्यादा मन पर होता है।

एक दूसरी ही दुनिया है लंदन या कहें कि ब्रिटेन, पता ही नहीं चलता कहाँ तक रास्ता जमीन पर रहता है और कहाँ सुरंग में चला जाता है। लोग इतने अनुशासित कि कोई नहीं देख रहा, कम से कम सीधे तौर पर, फिर भी कोई सामान गायब नहीं होगा, यहाँ तो साहसी लोग एटीएम मशीन जैसी भारी-भरकम वस्तु को भी उखाड़कर ले जाने का दम-खम रखते हैं।

वैसे इंसानों की तो क्या बात करें, पिछले दिनों खबर आई थी कि किसी एटीएम मशीन में चूहों या शायद एक ही चूहे ने, लगातार मेहनत करके लाखों रुपए के नोट बरबाद कर दिए थे। अब लिख लो एफ आई आर!

खैर एक महीने के बाद इधर गोआ में लौटे तो यहाँ घनघोर बारिश का मौसम शुरू हो चुका था। पिछले साल ही हम गुड़गांव से गोआ आए थे और मुझे उस समय ऐसा लगा था कि यहाँ ज्यादा जल भराव या सड़कों को नुकसान नहीं होता, लेकिन इस बार मालूम हुआ कि मैं गलत था।

आज रफी साहब का गाया एक गीत याद आ रहा है, जिसमें नशे और बेखुदी को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया था, गीत के बोलों में भी और रफी साहब के अंदाज़ में भी!
मजरूह सुल्तानपुरी जी के लिखे इस गीत को संगीतबद्ध किया है सचिन देव बर्मन जी ने। लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गए,
सागर में ज़िंदगी को उतारे चले गए।

देखा किए तुम्हें हम, बनके दिवाना,
उतरा जो नशा तो, हमने ये जाना,
सारे वो ज़िंदगी के सहारे चले गए।

तुम तो न कहो हम, खुद ही से खेले,
डूबे नहीं हम यूं ही, नशे में अकेले
शीशे में आपको भी उतारे चले गए।
हम, बेखुदी में तुमको पुकारे चले गए॥

चलिए जी हीरो महोदय, जैसे इस फिल्म में देव आनंद नायक थे। हाँ तो नायक महोदय अपने घर में बैठकर, नशे में कहीं भी उतरते चले जाएं, लेकिन इस बरसात के मौसम में कोई बीच सड़क पर ऐसा करे तो उसका भगवान ही मालिक है। नहीं जी, ऐसा बोलते हैं, वरना तो सबका ही भगवान मालिक है।

नमस्कार।