अपनी ब्लॉग पोस्ट में, आज ब्लॉग लेखन के बारे में ही चर्चा करना चाहूंगा। जैसा कि ब्लॉग पोस्ट पर दिए गए नंबर से पता चलता है, ये मेरी 237 वीं पोस्ट है। बीच-बीच में मैं पुरानी पोस्ट दोहराता भी रहता हूँ, क्योंकि शुरु में मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले भी अधिक नहीं थे। लेकिन यह 237 वीं नई पोस्ट है।

मैं जब युवा था, तब कविताएं, गीत लिखा करता था। समय के साथ वो सब छूट गया। आज मुझे कविता लिखने और फिर उसे छपवाने में अधिक संभावनाएं भी नजर नहीं आतीं, और वह काम अब ज्यादा सहज भी नहीं लगता अपने लिए। लंबे समय के बाद मैंने पाया कि आजकल स्वयं को अभिव्यक्त करने का, दूसरे लोगों तक पहुंचने का बहुत अच्छा साधन है ब्लॉग-लेखन! यही सोचकर शायद 14-15 महीने पहले मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया।

मुझे ‘मेरा नाम जोकर’ का एक दृश्य याद आ रहा है। जोकर ‘राजू’ ने किसी तरह सर्कस में ‘जोकर’ की नौकरी पा ली थी, जो काम करते हुए उसके पिता का स्वर्गवास ऊपर से गिरकर हो गया था, और दर्शक इसे भी एक करतब मानकर ताली बजा रहे थे! इसी कारण उसने अपनी बीमार मां को यह नहीं बताया था कि वह क्या काम करता है।

किसी तरह मां को यह संकेत मिलता है और वह सर्कस में पहुंच जाती है, तब मां को देखकर ‘राजू’ बोलता है- ‘मैं क्या करता मां, मेरी रगों में मेरे पिता का खून दौड़ रहा था, मैं जाता तो कहाँ जाता, मुझे यहीं आना पड़ा, और इस बार राजू को गिरता देखकर उसकी मां स्वर्ग सिधार जाती है!

ये सब कहने का आशय यही कि कविता लिखना तो छोड़ दिया, लेकिन जब ब्लॉग के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करने का मौका आया तो यही आसान लगा कि कविता, फिल्मी गीत आदि को मुख्यतः अपनी विषय वस्तु बनाया जाए। गीत-संगीत भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं और राज कपूर, मुकेश, गुलाम अली, जगजीत सिंह आदि मुझे अत्यंत प्रिय हैं। कवियों का नाम लूंगा तो बहुत लंबी सूची हो जाएगी, ये मेरा सौभाग्य है कि बहुत से कवियों से, एक आयोजक की भूमिका अपनाने के कारण निकट मित्रता भी हो गई थी!

हाँ तो मुख्यतः मैं कविता, गज़ल, गीत-संगीत, फिल्मों आदि को लेकर ब्लॉग लिखता रहा। पिछले दिनों मैं एक माह तक लंदन में रहा और वहाँ जो ब्लॉग लिखे, उनमें से अधिकतर ‘यात्रा’ ब्लॉग की श्रेणी में आते थे जिनको लोगों ने अधिक पसंद किया और शायद उनके आधार पर ही मुझे एक इंडस्ट्रियल विज़िट के लिए भी आमंत्रित किया गया।

इंडस्ट्रियल विज़िट का यह अनुभव बहुत अच्छा रहा और इसमें पहली बार कुछ ब्लॉगर साथियों से भी मिलने का अवसर मिला और यह भी मालूम हुआ कि ब्लॉग लेखन में कमाई की भी बहुत संभावनाएं हैं। लेकिन जो विषय कमाई वाले हो सकते हैं उनमें तो मेरी रुचि और प्रवृत्ति ही नहीं है, जैसे ‘मनी मैनेजमेंट’ एक अच्छा विषय है, लेकिन मैं तो ‘निदा फाज़ली’ साहब का फॉलोवर हूँ-

दो और दो का मेल हमेशा, चार कहाँ होता है,
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

तो धन के मैनेजमेंट के बारे में तो मैं एकदम फेल हूँ, इसके बाद आता है होटलों और रेस्त्रां का रिव्यू करना, होटलों में सुविधाओं के बारे में, मेज़बानी के बारे में तो कोशिश कर सकता हूँ, लेकिन भोजन तो मुझे हमेशा अच्छा ही लगता है, हाँ घर पर ज्यादा अच्छा लगता है और बाहर का खाना थोड़ा भारी लगता है!

एक क्षेत्र है ट्रैवल यानी यात्रा का, यात्रा का शौक तो मुझे शुरू से रहा है, इस विषय पर लिखा पहली बार, लंदन प्रवास के दौरान! अब कोशिश करूंगा कि आगे कुछ लिखूं और शायद शुरुआत के लिए अपनी कुछ पुरानी यात्राओं को भी ‘कवर’ कर सकता हूँ, क्योंकि-

घर पहुंचकर भी न होतीं खत्म यात्राएं,
गूंजती हैं सीटियां अब हम कहाँ जाएं।

मन में बस यही आता है कि कोई अच्छा स्पांसर मिल जाए तो यात्रा करता रहूं और लिखता रहूं।

अंत में स्व. रामावतार त्यागी जी के एक गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

गमलों में सजते यूं घबराता हूँ,
तुम सुंदरता के नाम तराशोगे,
जब घावों को सहलाता देखोगे,
तब भी तुम आते-जाते खांसोगे,
मैं हूँ सरसों का फूल, मगर मेरा यह धर्म नहीं,
शहरी उद्यानों का दिग्गज बनना| 

मैं कवि हूँ मेरे बस की बात नहीं,
हर कालजयी कुल का वंशज बनना!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।