मैं माननीय प्रधानमंत्री जी का ध्यान, सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्र के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की समस्या की ओर दिलाना चाहता हूँ।

मैंने पहले भी माननीय प्रधानमंत्री जी की साइट पर इस संबंध में लिखा था, उसके बाद प्रधान मंत्री जी ने शायद ‘मन की बात’ कार्यक्रम इस विषय का उल्लेख भी किया था।

पहली बात तो यह है कि सार्वजनिक उद्यमों में 20-30 साल तक सेवा करने के बाद, भविष्य निधि कार्यालय के माध्यम से, ईपीएस-95 के अंतर्गत जो पेंशन मिलती है- 1300-1400 रुपये, वह वास्तव में एक तरह का ‘अपमानदेय’ है, जैसे कि कुछ जगह मानदेय मिलता है!

ऐसा भी सुनते हैं कि बहुत से लोग, इस मामले मे अदालत में ‘केस’ करके अपनी पेंशन को कम से कम 10 से 12 हजार करा पा रहे हैं, क्योंकि सिस्टम में कुछ गड़बड़ी चली आ रही है। केस जीतने पर पहले उन लोगों को 5-6 लाख जमा कराना होता है, अपने कंट्रीब्यूशन को बढ़ाने के लिए, फिर उनको 8-10 लाख रुपये एक साथ मिल जाते हैं, एरियर के तौर पर और उसके बाद बढ़ी हुई पेंशन मिलने लगती है!

मेरा यही निवेदन है कि जैसे कहा जाता है कि तीर्थ जाओगे तो फल मिलेगा, वैसे ही न्यायालय को तीर्थ का दर्जा क्यों दे दिया गया है, अगर इस प्रकार कर्मचारी के कंट्रीब्यूशन की जमा राशि को बढ़ाकर, फिर उस आधार पर बढ़ी हुई पेंशन देने की व्यवस्था हो सकती है, तो भविष्य निधि संस्थान स्वयं यह केल्कुलेशन करके बढ़ी हुई पेंशन क्यों नहीं दे सकते हैं। अदालत में केस लड़ने और एक बार लाखों रुपया जमा करने की फॉर्मेलिटी क्यों करनी पड़े।

यह समस्या लाखों लोगों की है, इसलिए मैं उठा रहा हूँ। मैं स्वयं तो ईश्वर की कृपा से इसके बिना भी काम चला सकता हूँ, परंतु बहुत से लोग ऐसे होंगे जो इस कुव्यवस्था के कारण आज बहुत दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं।

एक और बात, जिसका उल्लेख प्रधान मंत्री जी ने किया था, कि हर वर्ष बैंक आदि में जाकर, खुद को जीवित घोषित कराने की फॉर्मेलिटी अब समाप्त हो गई है! इस विषय में मैं माननीय प्रधानमंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूँ कि नौकरशाही बहुत चालाक है। एक तो ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ का नाम बदल दिया गया, और ऐसा बताया गया कि मोबाइल में कोई ऐसा ‘ऐप’ है जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं अपना जीवित होना प्रमाणित कर सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह ऐप हजारों में किसी एक पेंशनर के पास, कुछ खास किस्म के मोबाइल सेटों में उपलब्ध होता है। फिर कुछ विशेष किस्म के भविष्य निधि कार्यालय हैं, जैसे लखनऊ में, जो आगे बढ़ना ही नहीं चाहते, हर वर्ष ‘जीवन प्रमाण पत्र’ भेजने के बावजूद वे अक्सर पेंशन भेजना बंद कर देते हैं, फिर आप बार-बार बताते रहिए कि ‘हम अभी तक जिंदा हैं हुज़ूर’, हमारा ‘अपमानदेय’ हमको दे दीजिए ना प्लीज़!

माननीय प्रधानमंत्री जी, इस प्रकार के विषयों पर आप अक्सर ध्यान देते हैं, इसलिए अनुरोध कर रहा हूँ कि इस क्षेत्र में व्याप्त अव्यवस्था को यदि आप दूर कर पाएं, तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

सादर नमस्कार।