सक्रिय राजनीति में शामिल एक ऐसा नेता, जिसको देखकर, सुनकर लगता था कि राजनीतिज्ञ भी आदर के पात्र हो सकते हैं। एक ऐसा राजनेता जो पहले एक सहृदय कवि था और उसके बाद पॉलिटिशियन था।

बचपन से, दिल्ली में रहकर उनको जनसभा में भी कई बार सुनने का अवसर मिला, टीवी पर बोलते हुए अथवा अखबारों में उनके भाषणों की कवरेज तो पढ़ते ही थे।

उनको सुनते हुए अक्सर लगता था कि ‘अरे इतना ही बोले, हम तो लंबा भाषण सुनने आए थे!’ लेकिन जब उस भाषण की रिपोर्ट पढ़ते थे, तब पता लगता था कि  इतनी सारी बातें कही थीं। वे भावुकता, सरसता और जहाँ आवश्यक हो आक्रोश में बोलते जाते थे और श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे और अचानक तब झटका लगता था, जब पता चलता था कि  भाषण तो समाप्त हो गया।

दिल्ली के रामलीला मैदान में हुए उनके एक भाषण की याद आ रही है। यह भाषण उन्होंने उस समय दिया था जब जनसंघ लोकसभा के चुनाव तो हार गई थी, लेकिन नगर निगम के चुनाव जीत गई थी। तब कांग्रेस के लोगों ने कहा कि जनसंघ को जनता ने झाड़ू सौंप दी है!

इस पर अटल जी ने अपने भाषण में कहा था (जैसा मुझे याद आ रहा है)-

जी हाँ हमें झाड़ू दी गई है,
और हम जमकर झाड़ू लगाएंगे,
हम कोई कूड़ा यहाँ नहीं रहने देंगे।
हम तो भारतमाता के उपासक हैं,
हम उसकी पूजा करने आए हैं,
यह अर्पण की भूमि है,
ये तर्पण की भूमि है,
ये समर्पण की भूमि है,
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है!

इस प्रकार के बहुत से भाषणों की याद आती है, सदन में जब वे बोलते थे तब विरोधी भी लाजवाब होकर सुनते थे। जब उनकी सरकार एक वोट से गिरी थी, क्योंकि उन्होंने जोड़-तोड़ करके सरकार बचाने की कोशिश नहीं की, उस समय दिया गया उनका भाषण बेमिसाल था, जिसमें उनकी ईमानदारी और स्वाभिमान की झलक मिलती है।

हास-परिहास अक्सर उनके भाषण में शामिल होता था। एक बार भाषण में बोले- ‘पार्लामेंट में हमारी इंदिरा जी से बहस हो गई, वो बोली आप हिटलर जैसे हैं, मैंने कहा मैं किधर से हिटलर लगता हूँ, वे बोलीं कि आप हाथ उठाकर बोलते हैं। इस पर मैंने कहा कि मैंने आज तक ऐसा वक्ता नहीं देखा जो पैर उठाकर बोलता हो!’

एक बार जब ज्ञानी जैल सिंह गृह मंत्री थे, तब बोले कि हम सवाल पूछते हैं और जैल सिंह जी जवाब देते हैं, अब उनकी बात हम क्या समझ पाएंगे, वो ज्ञानी, हम अज्ञानी!’।

संसद में और जनसभाओं में अटल जी द्वारा दिए गए भाषण और किया गया कविता-पाठ अब हमारी धरोहर है, बातें तो बहुत हैं कहने को, लेकिन अब अंत में उनकी एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर लेता हूँ, जो उनकी निष्ठा, स्वाभिमान और जुझारूपन की काव्यमय अभिव्यक्ति है-

गीत नया गाता हूं।
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,
झरे सब पीत पात, कोयल की कुहुक रात,
प्राची में अरुणिम की रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं।

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं।

अंत में उस महान कवि हृदय राजनेता को मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

नमस्कार।