कल मैंने बताया कि मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी के गाये, प्रेम के और नायिका सौंदर्य वर्णन के कई सुंदर गीत एक साथ याद आ रहे हैं। कोशिश करूंगा कि कुछ दिनों तक अपने प्रिय ऐसे कुछ गीत शेयर करूं।

इस क्रम में आज 1965 में रिलीज हुई फिल्म- ‘नई उमर की नई फसल’ के लिए नीरज जी का लिखा यह गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे मुकेश जी ने रोशन जी के संगीत निर्देशन में, बेहद खूबसूरत तरीके से गाया था।

आइए आज इस प्यारे से गीत को याद कर लेते हैं, जिसमें विख्यात हिंदी गीतकार नीरज जी ने, नायिका के सौंदर्य को बहुत सुंदर तरीके से गीत में पिरोया है –

 

देखती ही रहो आज दर्पण न तुम
प्यार का ये महूरत निकल जाएगा, निकल जाएगा

साँस की तो बहुत तेज़ रफ़्तार है
और छोटी बहुत है मिलन की घड़ी
गूँथते गूँथते ये घटा साँवरी
बुझ न जाये कहीं रूप की फुलझड़ी
चूड़ियाँ ही न तुम–
चूड़ियाँ ही न तुम खनखनाती रहो
ये शरमसार मौसम बदल जायेगा, बदल जायेगा।

सुर्ख होंठों पे उफ़ ये हँसी मदभरी
जैसे शबनम अँगारों की मेहमान हो
जादू बुनती हुई ये नशीली नज़र
देख ले तो ख़ुदाई परेशान हो
मुस्कुराओ न ऐसे —
मुस्कुराओ न ऐसे चुराकर नज़र
आइना देख सूरत मचल जायेगा, मचल जायेगा।

चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरी
नींद सूरज सितारों को आने लगे
इतने नाज़ुक क़दम चूम पाये अगर
सोते सोते बियाबान गाने लगे
मत महावर रचाओ–
मत महावर रचाओ बहुत पाँव में
फ़र्श का मरमरी दिल दहल जायेगा, दहल जायेगा
देखती ही रहो आज दर्पण न तुम।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।