इंसान के बारे में बहुत सारी विशेषताएं लोग समय-समय पर बताते हैं। उनमें से एक यह भी है कि वह एक सामाजिक प्राणी है, और सामाजिक होने का मतलब यह भी है कि वह एक प्रतिक्रियाशील प्राणी है, क्योंकि अगर वह किसी बात पर प्रतिक्रिया ही नहीं देगा, तब वह सामाजिक प्राणी भी कहाँ हुआ, तब तो मान सकते है कि वह दर्शक-दीर्घा में बैठा है!


हाँ तो हम छोटी-बड़ी बातों पर साथ-साथ प्रतिक्रिया देते चलते हैं, लेकिन कभी कोई ऐसा प्रसंग आता है कि हम तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते, कहते हैं कि ये बात लंबी हो जाएगी, फिर कभी इस बारे में बात करेंगे और कभी-कभी वो ‘फिर कभी’, कभी नहीं आता!

और कुछ नहीं जी, बस ज़नाब मसरूर अनवर जी की लिखी एक गज़ल याद आ रही थी, जिसे गुलाम अली जी ने अपने मधुर स्वर में गाकर बहुत प्रसिद्धि दिलाई है। इस गज़ल से पहले उन्होंने अलग से जो पंक्तियां गाई हैं, पूर्णता की दृष्टि से वे भी यहाँ दे रहा हूँ-

दिल की चोटों ने कभी, चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा, मैंने तुझे याद किया।
इसका रोना नहीं, क्यों तुमने किया दिल बरबाद,
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया।

हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही,
किस ने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही।

दिल के लुटने का सबब, पूछो न सब के सामने,
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही।

नफ़रतों के तीर खाकर, दोस्तों के शहर में,
हम ने किस किसको पुकारा, ये कहानी फिर सही।

क्या बताएँ प्यार की बाज़ी, वफ़ा की राह में,
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।