अभी दो तीन दिन पहले ही राजनैतिक परिप्रेक्ष्य का संदर्भ देते हुए श्रीरामचरितमानस के सुंदर कांड से कुछ भाग उद्धृत किया था, जिसमें महाबली रावण के अहंकार और विनाशोन्मुख होने को दर्शाया गया था, जब उसको किसी की सलाह अच्छी नहीं लगती।

 

 

फिर मुझे खयाल आया कि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस,  वास्तव में एक काव्य के रूप में एक अद्वितीय कृति है, इतना सरस और विषद काव्य कम से कम मैंने तो कोई और नहीं देखा है। मेरे विचार में, इस ग्रंथ का धार्मिक महत्व तो अपनी जगह है, यह एक काव्य-कृति के रूप में भी अद्वितीय है और उस पर भी इस ग्रंथ का सुंदरकांड, वास्तव में अत्यंत सुंदर है। इस खंड में विशेष रूप से हनुमान जी के चरित्र से मैं विशेष रूप से प्रेरित होता हूँ।

मेरा मन है कि मैं सुंदरकांड को एक काव्यकृति के रूप में ही यहाँ कुछ हद तक शेयर करूं। मैं कोई नियमित पूजा-पाठ करने वाला धार्मिक व्यक्ति नहीं हूँ, सुंदरकांड का जो भाग मेरे प्रिय गायक स्व. मुकेश जी के स्वर में रिकार्ड किया गया है, उसको मैं अक्सर सुनता हूँ और उसके कुछ भाग को ही यहाँ शेयर कर रहा हूँ।

आज जो भाग शेयर कर रहा हूँ, उसमें प्रसंग यह है कि लंका में सीता माता की खोज के लिए लोगों को भेजना था और उसके लिए समुद्र पार करने की भी आवश्यकता थी। सम्राट सुग्रीव की सेना के एक नायक- जांबवंत जी,  हनुमान जी को उनकी शक्तियों का स्मरण कराते हैं और उनको लंका की ओर प्रस्थान करने की सलाह देते हैं, हनुमान प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ते हैं, मार्ग में उनको सुरसा मिलती हैं, जिसे देवताओं की तरफ से हनुमान जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा गया था।

लीजिए इस अत्यंत सरस और प्रभावित करने वाले प्रसंग का कुछ अंश, गोस्वामी जी की इस महान रचना से प्रस्तुत है-

 

जांबवंत के वचन सुहाए, सुनि हनुमंत हृदय अति भाए,

बार-बार रघुवीर संभारी, तरकेऊ पवन-तनय बल भारी।

जेहि गिरि चरण देहि हनुमंता, चलेउ सो गा पाताल तुरंता।

जिमि अमोघ रघुपति कर बाणा, तेहि भांति चलेऊ हनुमाना।

 

जात पवनसुत देवन देखा, जाने कहुं बलबुद्धि विशेखा,

सुरसा नाम अहिन के माता, पठइनि आई कहि सो बाता।

 

आज सुरन मोहि दीन्ह अहारा, सुनत वचन कह पवन कुमारा,

राम काज करि फिर मैं आवहुं, सीता कै सुधि प्रभुहि सुनावहुं,

तब तव वचन पैठि हम आई, सत्य कहऊं, मोहि जान दे माई।

 

कवनेऊ वचन देहि नहीं जाना, ग्रससि न मोहि कहेऊ हनुमाना।

जस-जस सुरसा बदन बढ़ावा, तासु दून कपि रूप दिखावा,

योजन भर तेहि आनन कीन्हा, अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।

बदन पैठि पुनि बाहर आवा, मांगा विदा जाई सिर नावा।

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा, बुधि-बल मरम तोर मैं पावा।

 

राम काज सब करिहऊ, तुम बल बुद्धि निधान,

आसिष देई गई सो, हरषि चलेऊ हनुमान।

 

आज के लिए इतना ही, आगे का प्रसंग कल शेयर करने का प्रयास करूंगा।

नमस्कार।

 

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