गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड से कुछ अंश प्रस्तुत करने के क्रम में कल हनुमान जी ने लंकिनी से निपटने के बाद उसकी शुभकामनाएं प्राप्त कर ली थीं और इसके बाद उनके लंका में प्रवेश और सीता-माता की खोज और उनके पास तक पहुंचने का प्रसंग आज होगा।

 

 

प्रारंभ में हनुमान जी अत्यंत छोटा रूप बनाकर प्रवेश करते हैं और वहाँ घरों में खोज करते हैं, घरों को गोस्वामी जी ‘मंदिर’ की संज्ञा देते हैं। दशानन के घर में जो कुछ दिखाई देता है वह अच्छा तो नहीं होता, लेकिन गोस्वामी वहाँ की कमियों का उल्लेख नहीं करते, बस इतना ही कहते हैं- ‘अति विचित्र, कहि जात सो नाही’। विभीषण से हनुमान जी की भेंट होती है और मार्गदर्शन प्राप्त होता है और वे सीता-माता के दर्शन करते हैं, उनकी दशा देखकर दुखी होते हैं और उनको धीरज बंधाते हैं।

लीजिए आज का प्रसंग प्रस्तुत है-

अति लघु रूप धरेऊ हनुमाना, पैठा नगर सुमिरि भगवाना।
मंदिर-मंदिर प्रति कर सोधा, देखे जहं-तहं अगनित योधा,
गयऊ दशानन मंदिर माहीं, अति विचित्र कहि जात सो नाहीं।
सयन किए देखा कपि तेही, मंदिर मह न दीखि वैदेही।
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भवन एक अति दीख सुहावा, हरि मंदिर तहं भिन्न बनावा।
लंका निसिचर निकर निवासा, इहाँ कहाँ सज्जन कर वासा,
मन महं तरक करै कपि लागा, तेहि समय विभीषण जागा।
राम-नाम तेहि सुमिरन कीन्हा, हृदय हरस कपि सज्जन चीन्हा,
विप्र रूप धरि वचन सुनाए, सुनत विभीषण उठि तहं आए।
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तब हनुमंत कहा सुन भ्राता, देखि चहऊं जानकी माता,
जुगति विभीषण सकल बताई, चलेऊ पवनसुत विदा कराई,
धरि सोई रूप गयऊ कपि तहवां, वन असोक सीता रह जहवां।
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निज पग नयन दिए, मन राम पद कमल लीन,
परम दुखी भा पवनसुत, देखी जानकी दीन।
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तेहि अवसर रावन तहं आवा, संग नारि बहु किए बनावा,
कह रावन सुनु सुमुखि सयानी, मंदोदरी आदि सब रानी,
तव अनुचरी करहुं पन मोरा, एक बार विलोकु मम ओरा।
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तृण धरि ओट कहसि वैदेही, सुमिरि अवधपति परम सनेही,
सठ सूने हर-आनेही मोही, अधम निलज्ज लाज नहीं तोही।
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सीता तैं मम कृत अपमाना, कटिहऊं तव सिर कठिन कृपाणा,
कहसि सकल निसिचरिन्ह बुलाई, सीतहि बहुविधि त्रासहु जाई,
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भवन गयऊ दसकंधर, इहाँ पिसाचिनि वृंद,
सीतहिं त्रास दिखावहिं, धरहीं रूप बहु मंद।
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त्रिजटा नाम राच्छसी एका, रामचरण रति, निपुण विवेका,
सबसों बोलि सुनावसी सपना, सीतहि सेई करहु हित अपना।
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त्रिजटा सन बोली करजोरी, मातु विपति संगिनी तैं मोरी,
तजहुं देह करु वेगि उपाई, दुसह विरह अब नहीं सहि जाई।
आनि काठ-रज चिता बनाई, मातु अनल पुनि देहु लगाई।
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निसि न अनल मिलि सुनु सुकुमारी, अस कहि सो निज भवन सिधारी।
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कपि करि हृदय विचार, दीन्हि मुद्रिका डारि तब,
जिमि असोक अंगार, सीय हरसि उठि कर गहेऊ।
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तब देखी मुद्रिका मनोहर, राम नाम अंकित अति सुंदर।
चकित चितव मुदरी पहिचानी, हरस-विषाद हृदय अकुलानी,
सीता मन विचार करि नाना, मधुर वचन बोलेहु हनुमाना।
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रामदूत मैं मातु जानकी, सत्य सपथ करुणा निधान की,
यह मुद्रिका मातु मैं आनि, दीन्हि राम तुम कहुं सहिजानी।
जो रघुवीर होती सुधि ताहि, करते नहीं विलंब रघुराई,
अबहिं मातु मैं जाऊं लवाई, प्रभु आयसु नहीं राम दोहाई।
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आसिष दीन्ह राम प्रिय जाना, होहु तात गुणशील निधाना, 
अजर अमर गुण-निधि सुत होहू, करहिं सदा रघुनायक छोहू,
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अब कृतकृत्य भयहुं मैं माता, आसिष तब अमोघ विख्याता।
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मातु लागि मोहि अतिसय भूखा, लागि दीख सुंदर फल रूखा।
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देखि बुद्धिबल निपुण कपि, कहऊ जानकी जाऊ,
रघुपति चरण हृदय धरि, तात मधुर फल खाहु।

इसके बाद हनुमान जी फल खाने के लिए निकलते हैं, तब क्या होता है इसकी चर्चा बाद में।

आज के लिए इतना ही, आगे का प्रसंग कल शेयर करने का प्रयास करूंगा।
नमस्कार।

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