आज फिर हिंदी कवि सम्मेलनों में काफी लोकप्रिय कवि रहे- स्व. देवराज दिनेश जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। स्व. देवराज दिनेश जी वैसे व्यंग्य कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उन्होंने बहुत से गीत भी लिखे थे और यह उनके प्रिय गीतों में से एक है। यह एक प्रेमगीत है या कहें ऐसे प्रेम से जुड़ा गीत है, जिसे समाज स्वीकार नहीं करता, वह जातिभेद के कारण हो, या जो भी कारण हो।

ऐसा प्रेम जो गुपचुप किया तो जा सकता है परंतु उसे समाज के सामने स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका परिणाम कुछ भी हो सकता है, हत्या भी!
लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

मैं तेरे पिंजरे का तोता,
तू मेरे पिंजरे की मैना,
यह बात किसी से मत कहना।

 

मैं तेरी आंखों में बंदी,
तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण,
मैं चलता तेरी सांस–सांस,
तू मेरे मानस की धड़कन,
मैं तेरे तन का रत्नहार,
तू मेरे जीवन का गहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

हम युगल पखेरू हंस लेंगे,
कुछ रो लेंगे कुछ गा लेंगे,
हम बिना बात रूठेंगे भी,
फिर हंस कर तभी मना लेंगे,
अंतर में उगते भावों के,
जलजात किसी से मत कहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

क्या कहा! कि मैं तो कह दूंगी!
कह देगी तो पछताएगी,
पगली इस सारी दुनियां में,
बिन बात सताई जाएगी।
पीकर प्रिये अपने नयनों की बरसात,
विहंसती ही रहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

हम युगों युगों के दो साथी,
अब अलग अलग होने आए,
कहना होगा तुम हो पत्थर,
पर मेरे लोचन भर आए,
पगली इस जग के अतल–सिंधु में,
अलग अलग हमको बहना!
यह बात किसी से मत कहना!!

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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