मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज पांचवां दिन है, जैसा मैंने पहले कहा, मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस पांचवीं पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

पहले गीत में शाम के कुछ चित्र प्रस्तुत किए हैं, किस प्रकार एक सामान्य शहरी शाम को देखता है-

 

राख हुआ सूर्य दिन ढले

 

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

जला हुआ लाल कोयला
राख हुआ सूर्य दिन ढले।

 

होली सी खेल गया दिन
रीते घट लौटने लगे,
दिन भर के चाव लिए मन
चाहें कुछ बोल रस पगे,
महानगर में उंडेल दूध,
गांवों को दूधिए चले।
राख हुआ सूर्य दिन ढले।।

 

ला न सके स्लेट-पेंसिलें
तुतले आकलन के लिए,
सपनीले खिलौने नहीं
प्रियभाषी सुमन के लिए,
कुछ पैसे जेब में बजे
लाखों के आंकड़े चले।
राख हुआ सूर्य दिन ढले।।

 

एक गीत और जो कवि की ईमानदारी और स्वाभिमान को प्रदर्शित करता है-

 

एकलव्य हम

 

मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,
साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,
छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी,
यह हमसे कब हुआ।

 

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,
बालक सी निष्ठा से लिख दिए विरोध-पत्र,
बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,
यह हमसे कब हुआ।

 

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,
खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,
खुले हाथ-पांवों में बेड़ियां जतानी थीं,
यह हमसे कब हुआ।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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