कुछ दिन पहले ही प्रसिद्ध गीत कवि श्री किशन सरोज जी के निधन की खबर आई थी, मैं बाहर था अतः समय पर उनके बारे में नहीं लिख पाया।

स्व. किशन सरोज जी बहुत ही प्यारे गीतकार थे, एनटीपीसी में सेवा के दौरान हमारे कई आयोजनों में मैंने उनको आमंत्रित किया था, श्री सोम ठाकुर जी के साथ भी उनकी घनिष्ठ मित्रता थी, दोनो एक-दूसरे की सृजनशीलता का बहुत सम्मान करते थे।
मुझे विंध्यनगर का एक आयोजन याद आ रहा है, जो सुबह 4 बजे तक चला था और उसमें श्री किशन सरोज जी ने बहुत मन से कई प्यारे गीत सुनाए थे। उस कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए श्री सोम ठाकुर ने कहा था कि यह आपके लिए एक स्मरणीय घटना है कि आप इस आयोजन में श्री किशन सरोज जी के गीत सुन रहे हैं।

उस महान गीत ऋषि का स्मरण करते हुए, आज मैं श्रद्धांजलि स्वरूप उनका एक प्रसिद्ध गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

धर गये मेंहदी रचे
दो हाथ जल में दीप,
जन्म जन्मों ताल सा हिलता रहा मन।

 

बांचते हम रह गये अन्तर्कथा,
स्वर्णकेशा गीतवधुओं की व्यथा,
ले गया चुनकर कमल कोई हठी युवराज,
देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन।

 

जंगलों का दुख, तटों की त्रासदी
भूल सुख से सो गयी कोई नदी,
थक गयी लड़ती हवाओं से अभागी नाव,
और झीने पाल सा हिलता रहा मन।

 

तुम गये क्या जग हुआ अंधा कुँआ,
रेल छूटी रह गया केवल धुँआ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा हिलता रहा मन।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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