आज एक बार फिर से अपने एक प्रिय कवि/ गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी भारत भूषण जी के अनेक गीत शेयर रहे हैं और वे बहुत ही निराले सर्जक रहे हैं|

एक खास बात कि भारत भूषण जी अभिव्यक्ति के हर क्षेत्र मेन पवित्रता का आभास कराते थे| लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह प्रेम गीत-

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ,
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ|
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ,
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पडे पतझर से लाली,
तुम अरुणारे चरण धरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई,
प्रात न मेरा फूलों वाला|
तार-तार हो गया निमोही,
काया का रंगीन दुशाला|
जीवन सिंदूरी हो जाए,
तुम चितवन की किरन करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ,
काजल कर आँजूँ अँधियारी|
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर,
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ,
तुम प्राणों की अगन हरो तो|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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